Saturday, 25 June 2011
Tuesday, 26 April 2011
ऐसा क्यो होता है
ऐसा क्यो होता है
दिल ....और दिमाग करते है मशक़्क़त
कौन है ऐसा जो देगा इसका उत्तर
मुझ से पूँछा तू बता क्या है बेहतर
प्यार की गाली या दोस्ती की शिद्दत
सवाल गंभीर था
डूब गई सोच में!!
फिर बोली
ये दोनो है ज़िन्दगी की जरूरत
एक उम्र भर का साथ है और दूसरा खूबसूरत रिश्ता
दोस्ती है कच्ची मिट्टी ......
टूट -टूट कर बिखर बिखर कर ....
नये - नये रूप रखती है .....
प्यार उस मिट्टी का पक्का रूप है!!
जिसमें खुशियाँ तो है .....
पर गम की भी कडी धूप है ...!!!!!
जरा ढेस लगे तो दरार बने .....
फिर ज़िन्दगी किसी काम की नही रहती।
पल भर में ......पंगु कर देती है !! .....
पर दोनो में मिट्टी ही होती है !!
विश्वास और भरोसे की जो दोस्ती के कच्चे घड़े को पक्के प्यार के कलश में बदलती है ।
खुशी के सागर और गम की रात देती है....
हर पल रंग बदलती है !!
क्या है ......ये ??
पता नही !!
पल पल रंग बदलती .................है एक अलग सी दुनिया है ये.....
जहाँ बस प्रीतम के ख्याल ही मन में रहते है! .....
बस!
वो ही सपनो में और वो ही धड़कन में......!!!
दोस्ती भी फीकी लगती है !!
सब की ज़िन्दगी बदलती है ये प्यार की गाली!!
पर ......ये भी तो दोस्ती की इबादत पर बनी होती है !
ये दो आत्माओं की पूजा है ......!
भावो की अभिव्यक्ति है .....!
जिसने बस समर्पण ही सीखा है ....!
दोस्ती ने ही खुद को मिटा कर .........
प्रेम के ये रथ सीचा है ......!
दोस्ती ही पूजा है । इस जैसा न कोई दूजा है ।
पर जब सब से अच्छा दोस्त प्रेम बनता ....
तो बात ही अलग होती है ।
और जब वही प्रेम ........
उस दोस्ती के मिट्टी के कलश को तोड़ देता है!!!
तो कुछ बाँकी नही रह जाता ....
बस एक शरीर रह जाता है....
जिसमें ज़िन्दगी नही होती
वो सांस तो लेता है.......
पर जीने की इच्छा नही होती
उसका दिल तो धडकता है ........
पर खुशी नही होती
वो काम तो करता है ........
पर गति नही होती
एक पुतला बन कर रह जाता है ......
मन , आत्मा , शरीर , जज़्बात सभी कुछ तो रुक जाता है !
क्योकि यकीन ही नही हो पता कि जिस पर हम इतना यकीन कर चले थे !!!!
वो नही है हमारे पास ..........
चला गया है छोड कर बीच रास्ते में!
और पता नही ये सांस क्यों चल रही है???
बार बार खुद पर ही गुस्सा आता है ......
कि क्यों नही पहचान सके .......
उस प्यारे से चेहरे के पीछे छुपे उस हैबन को ..................................
चारू शर्मा
Thursday, 21 April 2011
क्यूँ ????

एक दिन बैठे हुए सोचा मैंने ...........
क्यूँ निकलता है दिन, क्यूँ रात होती है
क्यूँ भेद होता है, नर और नारी में
क्यूँ भेद होता है, काली और गोरी में
क्यूँ शांति के लिए प्यार के लिए, जगह नही इस जहान में
क्यूँ मानते है मृतक की आत्मा जाती है आसमान में
क्यूँ ईश्वर पर है भरोसा, इन्सान पर नही
क्यूँ हम में आप में एक शैतान है कहीं
क्यूँ आज इस जग में मानवता है नही
क्यूँ हर जगह हिंसा और पाशविकता है भरी
फिर सोचती हूँ ................................
आज कि यह जीवन है ब्यर्थ
जब हम इस जंहा को स्वर्ग बनाने में नही समर्थ
फिर अतंत: सोचते सोचते हो जाता है अंत
फिर नये जन्म के साथ शुरू होता है
एक नये क्यूँ................ का जन्म ??????????????????????????????
चारू शर्मा
Saturday, 16 April 2011
"ख्याल और दिमाग"
शाम के साये में, कुछ ख्याल आये थे!
कुछ मेरे अपने थे, कुछ थोड़े पराये थे!!
दिमाग में ख्यालों की गहमागहमी थी!
मै सोना चाहती थी, पर नींद से कोसो की दूरी थी!!
तभी अचानक दिमाग में कुछ हलचल हुई!
दिमाग के द्वार पर नए ख्याल की दस्तक हुई!!
दिमाग थका था सोना चाहता था!
ख्याल नया था दिमाग में दाखिल होना चाहता था!!
दोनों बहस कर रहे थे तर्क-वितर्क चल रहा था!
एक दरवाजे पर तो दूसरा भीतर से लड़ रहा था!!
ख्याल बोला दिमाग से, माना कि तू महान है सर्व शक्तिमान है!
पर न भूल मै ख्याल हूँ, तेरे वजूद कि शान हूँ!!
दिमाग बोला ख्याल से, तू तो एक ख्याल है, तुझे बनने में अभी साल है!
मेरे पास तो ख्यालों का जाल है!!
बात आगे बढ़ रही थी, दोनों कि जिद चढ़ रही थी!
तभी ख्याल दिमाग को धकिया के अंदर आ गया!!
मेरी बोझिल आँखों से नींद को भगा गया!
यही तो वो ख्याल था, जिसका मुझे इंतजार था!!
दिमाग भी समझ गया, चुपके से चलने लग गया!
न अब मुझे नींद थी, न दिमाग को थकान थी!!
बस उस एक ख्याल में बाकी कि शाम थी!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
चारू शर्मा
Saturday, 19 March 2011
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